Wednesday, June 26, 2019

प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए पहले भी बनती रही हैं फ़िल्में

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म 'पीएम नरेन्द्र मोदी' पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में है. दो दिन पूर्व इस फिल्म की सफलता का जश्न भी मनाया गया. इस फिल्म को लेकर कहा जा रहा है कि इसे पीएम को खुश करने के लिए ही बनाया गया.
यहाँ तक 'पीएम नरेन्द्र मोदी' से पहले भी कुछ फ़िल्में ऐसी आयीं जो पीएम मोदी और उनके कार्यों और योजनाओं का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करती थीं.
मसलन 'टॉयलेट एक प्रेमकथा', 'सुई धागा', 'उरी', 'एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर', 'मेरे प्यारे प्रधानमंत्री' और अब 'पीएम नरेन्द्र मोदी'. इसलिए कुछ लोग ऐसी हर फिल्म को लेकर यह कहते रहे कि ये फ़िल्में पीएम मोदी को खुश करने के लिए बन रही हैं.
यहाँ आपको बता दें कि यह पहली बार नहीं हो रहा कि प्रधानमंत्री को खुश करने या उनकी नज़रों या फिर उनके करीब आने के लिए फिल्मकार फिल्म बना रहे हों. सच्चाई तो यह है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के जमाने से ऐसा होता आ रहा है.
हालांकि गत 24 मई को प्रदर्शित 'पीएम नरेन्द्र मोदी' फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई धमाल करने में असमर्थ रही है. अपने प्रदर्शन से अब तक यह फिल्म देश में सिर्फ लगभग 24 करोड़ रूपये ही एकत्र कर पायी है.
जबकि इस फिल्म से जुड़े लोग यह मान कर चल रहे थे कि पीएम मोदी की लोकसभा चुनाव में प्रचंड विजय के बाद यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर प्रचंड सफलता प्राप्त करेगी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका.
असल में इस फिल्म को जितनी तीव्रता से बनाया गया उससे साफ़ है कि इस फिल्म को बनाने का पहला और बड़ा मकसद पी एम मोदी को खुश करना है. यकीन करना मुश्किल है कि इस फिल्म की शूटिंग इसी साल 28 जनवरी को शुरू हुई थी और मार्च अंत तक यानि सिर्फ दो महीने में यह फिल्म बनकर पूरी तरह तैयार थी.
इसे लोकसभा चुनाव से ठीक एक दिन पहले 11 अप्रैल को रिलीज़ होना था. लेकिन आचार सहिंता आदि और चुनाव आयोग तथा कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के चलते यह फिल्म लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद 24 मई को ही प्रदर्शित हो पायी. तब से अब तक थिएटर्स के साथ इसके विभिन्न निजी शो भी लगातार चल रहे हैं.
पिछले दिनों दिल्ली के महादेव रोड ऑडिटोरियम में कुछ सांसदों आदि के लिए इस फिल्म का विशेष शो हुआ.
हालांकि फिल्मकार उमंग कुमार 'पीएम नरेन्द्र मोदी' से पहले 'सरबजीत' और 'मेरीकॉम' जैसी सफल बायोपिक भी बना चुके हैं. लेकिन 'पीएम नरेन्द्र मोदी' को उन्होंने जिस तीव्र गति से बनाया वह कमाल था. हालांकि दर्शकों ने इस फिल्म के प्रति 'उरी' फिल्म जैसा उत्साह नहीं दिखाया.
भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी 'उरी' ने तो करीब 244 करोड़ रूपये का नेट बिजनेस करके सफलता का ऐसा नया इतिहास लिखा कि सभी दंग रह गए.
यहाँ तक प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता और शौचालय निर्माण अभियान पर अक्षय कुमार और भूमि पेड्नेकर की सन 2017 में प्रदर्शित फिल्म 'टॉयलेट एक प्रेमकथा' भी देश में ही लगभग 134 करोड़ रूपये का नेट बिजनेस करके सुपर हिट रही थी.
साथ ही पिछले वर्ष आई वरुण धवन और अनुष्का शर्मा की 'सुई धागा' फिल्म ने भी करीब 79 करोड़ रूपये एकत्र करके हिट फिल्मों में अपना नाम दर्ज करा लिया.
लेकिन 'पीएम नरेन्द्र मोदी' फिल्म अपने आप में इतना बड़ा नाम होने के बावजूद इसलिए एक औसत फिल्म बनकर रह गयी कि फिल्म में कई खामियां थीं.
इधर यदि ध्यान से देखें तो पिछले 50 बरसों से अधिक से ऐसे कई फ़िल्में बनती आ रही हैं जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री की योजनाओं, उपलब्धियों और उनके कार्यों आदि की खूब सराहना की गयी या फिर प्रधानमंत्री के कहने से फिल्मकारों ने फिल्म बनायीं.
इसकी बड़ी मिसाल सन 1964 में आई फिल्म 'हकीकत' भी है. फिल्मकार चेतन आनंद द्वारा बनायी गयी यह फिल्म नेहरु युग में हुए भारत-चीन युद्द को लेकर थी.
चीन ने हिंदी-चीनी भाई भाई का स्वांग रचकर भारत को धोखे में रख अचानक 1962 में भारत पर हमला बोल दिया था. इससे भारत को काफी नुक्सान हुआ और पंडित नेहरु भी इससे काफी आहत हुए थे.
क्योंकि इस युद्द में भारत की पराजय से जहाँ पंडित नेहरु की विदेश नीति और सक्षमता की आलोचना होने लगी वहां इस पराजय के लिए उन्हें ही पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाने लगा था.
ऐसे में चेतन आनंद ने 'हकीकत' बनाकर दुनिया को दिखाया कि हमारी भारतीय सेना ने अपने शौर्य से किस तरह चीनी सेना का मुकाबला किया. हमारा एक एक जाबांज सैनिक किस तरह से उनके सैंकड़ों सैनिक पर भारी पड़ा.
लेकिन चीन की पूर्व युद्द योजना और हमारी शान्ति की नीतियों सहित, परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हम यह युद्द जीत नहीं पाए. इस तरह इस फिल्म से एक सन्देश यह भी गया कि पीएम नेहरु को ही इस पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है.
हालांकि चेतन आनंद ने बलराज साहनी, धर्मेन्द्र, प्रिया राजवंश, जयंत और विजय आनंद जैसे कलाकारों के साथ इस फिल्म को बहुत ही खूबसूरती से बनाया.
फिल्म का गीत संगीत सभी कुछ इतना अव्वल की देश में युद्द की पृष्ठ भूमि पर बनी फिल्मों में, आज भी 'हकीकत' का स्थान बहुत ऊपर है. फिल्म की गिनती देश की चुनिन्दा कालजयी फिल्मों में होती है.
'हकीकत' में ऐसे कई संवाद थे जो दर्शाते थे कि चीन ने किस तरह भारत को धोखा दिया. ऐसा ही एक संवाद था- "आज एक दोस्त ने बगल में छुरा खोंपा है. हमारा बुद्ध,अशोक,गांधी और नेहरु का देश शान्ति का प्रतीक जरुर है पर यह बुजदिली का कायल नहीं."
हालांकि फिल्म पूरी होने के समय एक बडी घटना यह घटी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का निधन हो गया. यह देख चेतन आनंद बहुत दुखी हुए. लेकिन उन्होंने पंडित नेहरु की अंतिम यात्रा के दृश्यों को भी अपनी फिल्म के अंत में जोड़ लिया.
साथ ही फिल्म 'हकीकत' में वे वास्तविक दृश्य भी हैं जब इस युद्ध से दो बरस पहले चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री झाऊ एनलाई ने भारत आकर भाई भाई और दोस्ती का आडम्बर रचा था और भारत में एनलाई का स्वागत गर्म जोशी से किया गया था.
उधर चेतन आनंद ने 'हकीकत' फिल्म के शुरू में यह लिखित घोषणा भी दी- "यह फिल्म पूरी विनम्रता के साथ स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरु को समर्पित है. जो इस तरह के प्रयासों के लिए सदा प्रेरणा का स्त्रोत रहे और आज भी हैं."

Friday, June 14, 2019

هل حقا تؤدي القراءة إلى تحسين صحتك العقلية؟

ولا شك أن براون لا يقصد أن نتخلى عن أحلامنا، لكنه يحذر من تجاهل التيارات التي تدفعنا في اتجاهات مختلفة، كما ذكرنا في مثال السباح الذي يريد عبور النهر، أو أن نظن أن قوة إرادتنا وحدها ستساعدنا على مجابهتها، لأنك ستحيد عن مسارك لا محالة.
ويرى براون في المقابل أن الفلاسفة الرواقيين يوفرون بديلا أفضل لعيش حياة سعيدة. إذ ينصح هؤلاء الفلاسفة اليونانيون بإمعان الفكر قبل اتخاذ القرار للتمييز بين الأشياء التي نستطيع أن نغيرها والأشياء التي تخرج عن نطاق سيطرتنا، وبالتالي يجب أن نتعلم كيف نتقبلها كجزء لا يتجزأ من حياتنا.
ويقول براون: "تعودت على أن أفكر بهذه الطريقة كلما واجهت شيئا يضايقني أو يحبطني. حينها أتساءل، هل هذا الأمر الذي يعكر صفو حياتي هو نتيجة أفعالي ويمكنني التحكم به أم أنه أمر لست مسؤولا عنه، والحال كذلك في الغالب. وعندها أقول لنفسي ماذا لو كان الشخص الذي يزعجني مجرد شخص طائش وغبي، أو أن شريكة حياتي لا يمكنها التعامل مع الضغوط النفسية وهكذا. كل هذه الأمور تؤثر على نفسيتي لكني أحاول تقبلها لأنها ناتجة عن أخطاء الآخرين وليست مشكلتي أنا".
ويضيف براون أن هذا النوع من التفكير سيساعدك على تجاوز مشاكلك لأنك تزيح الهموم عن كاهلك، وبعدها قد تقرر أن تساعد هذا الشخص إن أردت، لكن الأهم من ذلك أنك لن تشعر بذلك الألم العاطفي الذي قد يتسلل إلى نفسك.
ويضرب مثالا بمباراة التنس، أو أي نوع من المنافسات، ويقول إنك إذا عزمت منذ البداية على الفوز، فهذا الهدف خارج عن إرادتك، وبمجرد ما تخسر نقاطا ستشعر بالفشل والقلق. لكنك في المقابل، لو قلت لنفسك منذ البداية سأبذل كل ما في وسعي لأقدم أفضل أداء، فأنت لن تكترث للخسارة، لأنك لم تخفق في تحقيق أهدافك.
وبالمثل، قد تتوجه إلى مقابلة عمل وأنت مقتنع بأن قرار صاحب العمل خارج عن سيطرتك حتى لو كان أداؤك ممتازا، وهذا سيهون عليك الألم إن لم تجتز المقابلة. وهذا يتوافق مع نموذج الفلسفة الرواقية للسعادة، الذي يركز على تفادي المنغصات.
وينصح براون بتخصيص بضع دقائق كل صباح للتأمل والتفكير في المشكلات والإحباطات التي من المحتمل أن تصادفها خلال اليوم والتهيؤ نفسيا لها. فإن النظر للأمور بشكل منطقي وموضوعي يذكرنا بأن بعض الأمور خارجة عن سيطرتنا ولا ينبغي أن ندعها تكدر مزاجنا، وفي الوقت نفسه يساعدنا في أن ننظر إلى التحديات الناتجة عن تصرفاتنا بحكمة، حتى لا نرتكب نفس الأخطاء مرارا وتكرارا.
أما عن مدى ملائمة الفلسفة الإغريقية القديمة للحياة العصرية المفعمة بالاضطرابات والتقلبات، فيقول براون: "ظهرت المدرسة الرواقية في عصر دارت فيه رحى الحروب والصراعات السياسية، وترددت أصداء آراء فلاسفتها لأنها كانت تدعو إلى النأي بالنفس عن الصراع والانشغال بالذات".
وينبه براون إلى أن هذا النمط من التفكير لا يسوغ للسلبية واللامبالاة، لكنه يساعدنا على أن ننعم بشيء من الراحة النفسية والسكينة عندما تشتد الأزمات حتى نختار المعارك التي نخوضها ولا ننفعل ونغضب كلما طرأ خلاف.
وهذا النوع من الانفصال الوجداني يساعدنا على مواجهة تحديات مواقع التواصل الاجتماعي. ويقول براون إنك قد تشعر بالحزن عندما تقارن حياة الآخرين المثالية التي يعرضونها على هذه المواقع بحياتك القاسية والبشعة التي تعيشها بالفعل، لأنك سيغيب عن ذهنك أن جميع الناس يواجهون نفس المصاعب.
ويضرب مثالا بمباراة التنس، أو أي نوع من المنافسات، ويقول إنك إذا عزمت منذ البداية على الفوز، فهذا الهدف خارج عن إرادتك، وبمجرد ما تخسر نقاطا ستشعر بالفشل والقلق. لكنك في المقابل، لو قلت لنفسك منذ البداية سأبذل كل ما في وسعي لأقدم أفضل أداء، فأنت لن تكترث للخسارة، لأنك لم تخفق في تحقيق أهدافك.